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5 अगस्त 2025 करेंट अफेयर्स | UPSC, SSC, PCS हेतु डेली करंट अफेयर्स |

 🇮🇳 भारत में राज्यों का भाषाई पुनर्गठन

📚 GS पेपर 1 और 2 | विषय: भारतीय संविधान, संघवाद, भाषा नीति
📰 स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस




🧠 यह खबर में क्यों है?

हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल ने भारत में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की आलोचना की। इससे यह बहस फिर से शुरू हो गई — क्या भाषाई आधार पर राज्यों को बांटना सही था या नहीं?


🕰️ पृष्ठभूमि: भारत में राज्यों का पुनर्गठन कैसे हुआ?

1. आजादी के बाद की स्थिति (1950-56)

1947 के बाद भारत में राज्यों की सीमाएं बहुत उलझी हुई थीं। ये ज़्यादातर ब्रिटिश काल की ही थीं।

1950 में राज्यों को ऐसे बाँटा गया था:

  • Part A – ब्रिटिश प्रांत (जैसे बॉम्बे, मद्रास)

  • Part B – रियासतें (जैसे हैदराबाद)

  • Part C – छोटे प्रांत (जैसे दिल्ली)

  • Part D – केवल अंडमान निकोबार

📢 लेकिन लोग भाषा और संस्कृति के आधार पर नए राज्यों की माँग करने लगे।


2. भाषाई राज्यों की मांग शुरू हुई

दक्षिण भारत में खासकर तेलुगु बोलने वालों ने अलग राज्य की मांग की।

पोट्टि श्रीरामलू नाम के स्वतंत्रता सेनानी ने 56 दिन की भूख हड़ताल की और 1952 में मृत्यु हो गई।
👉 इसके बाद 1953 में आंध्र राज्य बना (मद्रास से अलग किया गया)।


3. इस मुद्दे पर बनीं समितियाँ

a) धार आयोग (1948)

  • भाषा के आधार पर राज्य बनाने को गलत बताया।

  • डर था कि इससे भारत की एकता टूट सकती है।

b) जेवीपी समिति (1949)

  • सदस्य: नेहरू, पटेल, सीतारमैया

  • सलाह दी: जल्दबाज़ी न करो, भाषा से एकता में दरार आ सकती है।

c) राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC), 1953

  • अध्यक्ष: न्यायमूर्ति फज़ल अली

  • सदस्य: के.एम. पणिक्कर, एच.एन. कुंजरू

  • 1955 में रिपोर्ट दी

➡️ कहा: भाषा महत्वपूर्ण है लेकिन अकेली कसौटी नहीं होनी चाहिए — एकता, प्रशासनिक सुविधा, और आर्थिक तर्क भी जरूरी हैं।


4. राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956

  • SRC की रिपोर्ट के आधार पर अधिनियम पास हुआ

  • 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए

  • Part A, B, C, D सिस्टम खत्म किया गया

➡️ बने नए राज्य जैसे: मध्यप्रदेश, पंजाब, केरल, कर्नाटक

👉 बाद में झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना जैसे राज्य भी बने, स्थानीय पहचान और प्रशासनिक ज़रूरत के हिसाब से।


भाषाई पुनर्गठन के पक्ष में तर्क

1. संघवाद में सांस्कृतिक सम्मान

भारत विविधताओं से भरा है।
➡️ भाषा आधारित राज्य लोगों को सम्मान और पहचान देते हैं।
➡️ इससे लोकतंत्र मजबूत हुआ और अलगाववाद को रोका गया।

2. पाकिस्तान या श्रीलंका जैसी टूट-फूट नहीं हुई

  • पाकिस्तान में बांग्ला भाषियों पर अत्याचार हुआ → बांग्लादेश बना (1971)

  • श्रीलंका में तमिल-सिंहली संघर्ष ने हिंसा को जन्म दिया
    👉 भारत ने भाषा को सम्मान देकर ऐसी स्थितियाँ टाल दीं।

3. बेहतर प्रशासन और शासन

  • जब लोग अपनी भाषा में शासन समझते हैं, तो नीतियाँ बेहतर लागू होती हैं।

  • न्यायालय, शिक्षा और योजनाएं भी ज्यादा प्रभावी होती हैं।

4. क्षेत्रीय दलों का उदय

  • जैसे: DMK, शिवसेना, TMC आदि
    ➡️ इससे लोकतंत्र को स्थानीय ताकत मिली और नई आवाजें उभरीं।

5. विविधता में एकता

  • भारत का विभाजन नहीं हुआ

  • लोग अपने राज्य और देश दोनों पर गर्व करते हैं।


भाषाई पुनर्गठन के विरोध में तर्क

1. क्षेत्रीयता और भाषा वर्चस्व

  • कुछ राज्यों में एक भाषा दूसरी भाषाओं को दबाती है

  • जैसे महाराष्ट्र में मराठी बनाम हिंदी विवाद
    ➡️ इससे राज्यों के अंदर भी बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक विवाद पैदा होता है।

2. भाषा पर अत्यधिक राजनीति

  • कुछ नेता केवल सत्ता पाने के लिए नई राज्य की मांग करते हैं।

  • भाषा भावनाओं का राजनीतिक फायदा उठाया जाता है।

3. राज्य-राज्य विवाद

  • जैसे: कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच बेलगावी विवाद
    ➡️ भाषा के आधार पर सीमाएं आज भी विवाद का कारण हैं।

4. नए राज्यों की लगातार मांग

  • जैसे: गोरखालैंड, तुलुनाडु, विदर्भ आदि
    ➡️ इससे संसाधनों पर दबाव और राष्ट्रीय एकता को खतरा होता है।

5. राष्ट्रीय पहचान कमजोर होना

  • लोग कहते हैं: "हम पहले मराठी/तेलुगु/बंगाली हैं"

  • "हम पहले भारतीय हैं" — यह भावना कमजोर हो जाती है।


💡 भविष्य की रणनीति क्या हो सकती है?

1. किसी भाषा को जबरदस्ती न थोपें

  • हिंदी या किसी अन्य भाषा को थोपना सही नहीं
    ➡️ 3-भाषा फॉर्मूला लचीले तरीके से अपनाएं —
    राज्य तय करें: स्थानीय भाषा + हिंदी + अंग्रेज़ी या अन्य विकल्प

2. बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा

  • NEP 2020 के अनुसार — प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में हो

  • साथ ही दूसरी-तीसरी भाषाएँ भी सिखाई जाएं

3. राज्यों के अंदर अल्पसंख्यकों की रक्षा करें

  • अनुच्छेद 29 और 30 के तहत
    ➡️ भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और स्कूल चलाने का अधिकार मिले

4. सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ाएं

  • जैसे: एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना
    ➡️ यूपी के लोग तमिल संस्कृति जानें, तमिलनाडु के लोग भोजपुरी जानें

5. बहुभाषी शासन व्यवस्था

  • सरकार की योजनाएं, पोर्टल, फॉर्म्स — स्थानीय भाषा + हिंदी + अंग्रेज़ी में हों

  • Bhashini जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रयोग करें, जो अनुवाद में मदद करते हैं


निष्कर्ष

भारत एक बहुभाषी देश है — यही हमारी ताकत है।
भाषा का उद्देश्य जोड़ना है, तोड़ना नहीं।

👉 पिछली बार पुनर्गठन सफल रहा, क्योंकि विविधता का सम्मान हुआ।
👉 भविष्य में नीति बनाते समय समावेशिता, लचीलापन और सभी भाषाओं का आदर जरूरी है।
👉 तभी हमारा संघवाद और भी मजबूत होगा।


🇮🇳 एंटी-डिफेक्शन कानून (Anti-Defection Law)
🧠 GS पेपर 2: भारतीय संविधान | संसद | राज्य विधानमंडल | संवैधानिक संशोधन
स्रोत: Indian Express


📌 समाचार में क्यों?

हाल ही में पडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा के स्पीकर को फटकार लगाई।
🔹 उन्होंने विधायकों की अयोग्यता पर फैसला देने में देरी की जो 2024 में पार्टी बदल चुके थे।
इससे फिर से एंटी-डिफेक्शन कानून चर्चा में आ गया।


🧾 डिफेक्शन (दल-बदल) क्या होता है?

डिफेक्शन तब होता है जब कोई नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है – आमतौर पर निजी लाभ या सत्ता के लिए।

🗣️ जैसे कहें – "उधर ज़्यादा फायदा है, तो उधर चला गया!"

"आया राम, गया राम" वाक्य 1967 में मशहूर हुआ, जब हरियाणा का एक विधायक एक ही दिन में कई बार पार्टी बदल गया।


📜 एंटी-डिफेक्शन कानून की उत्पत्ति

आजादी के बाद लगातार हो रहे दल-बदल से देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी।
🗓️ 1985 में 52वां संविधान संशोधन करके संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
🔹 ये कानून संसद और राज्य विधानसभाओं – दोनों पर लागू होता है।

🛠️ 2003 में 91वें संशोधन ने इसे और मजबूत किया:

  • एक-तिहाई विभाजन की छूट हटा दी गई।

  • अब दो-तिहाई सदस्य अगर एक साथ विलय करें तो ही मान्य।

  • दलबदलू मंत्री नहीं बन सकते, जब तक दोबारा न चुन लिए जाएं।


🚫 अयोग्यता के आधार (Disqualification Grounds)

  1. पार्टी की सदस्यता छोड़ना – सिर्फ इस्तीफा नहीं, पार्टी विरोधी व्यवहार भी शामिल है।

  2. विप पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट देना या अनुपस्थित रहना।

  3. स्वतंत्र उम्मीदवार चुनाव के बाद किसी पार्टी में शामिल हो जाए।

  4. नामांकित सदस्य 6 महीने के बाद किसी पार्टी में शामिल हो जाए।


छूट (Exceptions)

  • अगर दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों, तो अयोग्यता नहीं लगेगी।

  • स्पीकर/डिप्टी स्पीकर/चेयरमैन अगर पार्टी छोड़ें, तो भी उनकी सीट नहीं जाएगी।


🧑‍⚖️ स्पीकर की भूमिका

स्पीकर/चेयरमैन तय करते हैं कि अयोग्यता होनी है या नहीं।
⚠️ लेकिन चूंकि वे अक्सर सत्ताधारी पार्टी से होते हैं, उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।


एंटी-डिफेक्शन कानून की आलोचना

  1. आंतरिक बहस खत्म हो जाती है – सांसद/विधायक अपने विवेक से वोट नहीं कर सकते।

  2. स्पीकर पक्षपाती हो सकते हैं – क्योंकि वे किसी पार्टी से जुड़े होते हैं।

  3. कोई समयसीमा नहीं – फैसले में सालों लग जाते हैं।

  4. हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा – दो-तिहाई वाली छूट से सौदेबाज़ी संभव होती है।

  5. व्हिप पारदर्शी नहीं होते – कई बार सांसदों को पता ही नहीं चलता।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का नजरिया

📌 केशव मेघचंद्र केस (2020):

  • स्पीकर को 3 महीने के अंदर फैसला देना चाहिए।

  • अयोग्यता मामलों के लिए स्वतंत्र ट्राइब्यूनल बनाने का सुझाव।

📌 रवि नाइक केस (1994):

  • स्पीकर को निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए, न कि पार्टी सदस्य की तरह।

📌 किहोटो होलोहान केस (1992):

  • स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

  • अगर स्पीकर पक्षपाती हो, तो कोर्ट दखल दे सकता है।

📌 पडी कौशिक रेड्डी केस (2025):

  • SC ने फिर संसद से कहा: कानून में सुधार करें।


🛠️ सुधाव के सुझाव

  1. कानून का दायरा सीमित करें

    • केवल बड़े मामलों (जैसे अविश्वास प्रस्ताव) में लागू करें।

  2. निर्णय लेने की शक्ति बदलें

    • स्पीकर की बजाय चुनाव आयोग या स्वतंत्र निकाय को दें।

  3. सख्त समयसीमा तय करें

    • जैसे 60 या 90 दिन में निर्णय देना अनिवार्य हो।

  4. आंतरिक लोकतंत्र बढ़ाएं

    • पार्टियों में बहस और मतभेद की गुंजाइश होनी चाहिए।

  5. पारदर्शिता बढ़ाएं

    • व्हिप आदेशों को सार्वजनिक करें।

    • अयोग्यता के केस सार्वजनिक रूप से दिखाए जाएं।


📚 विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशें

  • 170वीं विधि आयोग रिपोर्ट

  • दीनेश गोस्वामी समिति (1990)

  • विधि आयोग की रिपोर्ट (1999 और 2015)

  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC)

  • हाशिम अब्दुल हलीम समिति (1994)

➡️ सभी ने कहा – कानून समयबद्ध, पारदर्शी और निष्पक्ष निकाय द्वारा नियंत्रित हो।


🧾 निष्कर्ष

एंटी-डिफेक्शन कानून का उद्देश्य था दल-बदल पर रोक लगाना, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो।
लेकिन अब यही कानून राजनीतिक हथियार बन गया है – क्योंकि स्पीकर की शक्ति असीमित है और निर्णय में देरी होती है।

👉 सुप्रीम कोर्ट भी कह रहा है – अब बदलाव ज़रूरी है!
✅ अगर भारत को मजबूत लोकतंत्र चाहिए, तो यह कानून तेज़, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना ही होगा।


🧾 UPSC के लिए FAQ (प्रश्न-उत्तर)

❓1. राजनीति में डिफेक्शन क्या है?
👉 जब कोई नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है – अक्सर पद, पैसा या ताकत के लिए।

❓2. एंटी-डिफेक्शन कानून क्यों लाया गया?
👉 1960–80 के दशक में लगातार पार्टी बदलने से सरकारें गिर रहीं थीं। इसलिए 1985 में 52वां संविधान संशोधन कर यह कानून लाया गया।

❓3. दसवीं अनुसूची क्या है?
👉 संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून का पूरा विवरण है – किन हालातों में कोई नेता अयोग्य ठहराया जा सकता है।

❓4. इस कानून के तहत अयोग्यता का फैसला कौन करता है?
👉 लोकसभा के लिए स्पीकर, और विधान सभा के लिए राज्य स्पीकर

❓5. अयोग्यता के प्रमुख आधार क्या हैं?
👉

  • स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना (केवल इस्तीफा ही नहीं, व्यवहार भी)।

  • पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट देना या अनुपस्थित रहना।

  • चुनाव बाद स्वतंत्र उम्मीदवार का पार्टी में जाना।

  • नामित सदस्य का 6 महीने बाद पार्टी में जाना।


🇮🇳 भारत–EFTA TEPA: आर्थिक कूटनीति में एक बड़ा कदम
स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स (HT)
🧠 GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय समझौते | आर्थिक संबंध | भारत की विदेश नीति


📰 समाचार में क्यों?

TEPA समझौता (Trade and Economic Partnership Agreement) भारत और EFTA (European Free Trade Association) के बीच
🔹 1 अक्टूबर 2025 से लागू होगा।
🔹 10 मार्च 2024 को साइन हुआ — 2008 से अब तक 21 राउंड की बातचीत के बाद यानी पूरे 16 साल में ये डील फाइनल हुई।


🤝 TEPA क्या है?

TEPA = Trade and Economic Partnership Agreement
यह समझौता भारत और EFTA के चार देशों के बीच हुआ:
✅ आइसलैंड
✅ लिकटेंस्टीन
✅ नॉर्वे
✅ स्विट्जरलैंड
📝 (ये सभी देश यूरोपीय संघ (EU) के सदस्य नहीं हैं – प्रीलिम्स के लिए याद रखें!)

उद्देश्य:

  • व्यापार को बढ़ाना

  • निवेश लाना

  • नौकरियां पैदा करना

  • टैरिफ (आयात शुल्क) कम करना

  • व्यापार प्रक्रियाएं सरल बनाना


🔑 TEPA की मुख्य बातें

1. 💰 बड़ा निवेश वादा

  • EFTA भारत में अगले 15 वर्षों में $100 बिलियन का निवेश करेगा
    ◾ पहले 10 साल में $50 बिलियन
    ◾ अगले 5 साल में और $50 बिलियन

  • लक्ष्य: भारत में 10 लाख नौकरियां पैदा करना
    📌 (Mains के लिए यह निवेश वाला बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है!)


2. 🛃 टैरिफ में रियायत – कौन क्या देगा?

  • EFTA:
    ◾ 92.2% टैरिफ लाइनों पर रियायत देगा
    ◾ भारत के 99.6% निर्यात कवर होंगे (जैसे उद्योग व प्रोसेस्ड फूड)

  • भारत:
    ◾ 82.7% टैरिफ लाइनों पर रियायत देगा
    ◾ EFTA के 95.3% निर्यात कवर होंगे, जिसमें सोना भी शामिल है
    ❗ हालांकि सोने पर वास्तविक आयात शुल्क में कोई बदलाव नहीं हुआ है

  • भारतीय चावल (बासमती और गैर-बासमती) को ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा — और भारत को बदले में कुछ नहीं देना होगा 🎉


3. ❌ संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा

  • भारत ने डेयरी, सोया, कोयला, PLI-लिंक्ड सेक्टर (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा) को इस डील से बाहर रखा
    ➡️ किसानों और घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए यह अच्छा कदम है

  • EFTA के Sovereign Wealth Funds को कुछ FDI नियमों से छूट दी गई है, जिससे उन्हें भारत में निवेश करना आसान होगा


4. 🧑‍💼 सेवाएं और कुशल पेशेवरों को फायदा

  • भारत के आईटी, शिक्षा, संस्कृति, खेल क्षेत्र के पेशेवरों को फायदा मिलेगा

  • Mutual Recognition Agreements (MRA) की योजना इन क्षेत्रों में:
    ◾ नर्सिंग
    ◾ अकाउंटेंसी
    ◾ आर्किटेक्चर

📝 MRA = उनकी डिग्री = हमारी डिग्री → भारतीय पेशेवर EFTA देशों में आसानी से काम कर पाएंगे


5. ⚖️ कानूनी और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR)

  • कुल 14 चैप्टर्स शामिल हैं

  • एक खास शर्त:
    ❗ अगर EFTA वादा किया गया निवेश नहीं करता, तो भारत टैरिफ रियायतें वापस ले सकता है

  • भारत की जेनेरिक दवाओं की सुरक्षा बनी रहेगी

  • "Evergreening of patents" पर रोक — ये वो चाल है जिससे बड़ी कंपनियां दवाओं के पेटेंट को बेवजह बढ़ाती हैं


🌍 EFTA क्या है?

  • EFTA = European Free Trade Association

  • सदस्य देश:
    ✅ आइसलैंड
    ✅ लिकटेंस्टीन
    ✅ नॉर्वे
    ✅ स्विट्ज़रलैंड

  • EU का हिस्सा नहीं

  • 1960 में स्टॉकहोम कन्वेंशन के तहत बनी

  • उद्देश्य: दूसरे देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार को बढ़ावा देना


📦 भारत–EFTA व्यापार संबंध

1. 🔗 पार्टनर स्टेटस

  • भारत, EFTA का 5वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है
    (EU, अमेरिका, UK, चीन के बाद)

2. 📉 बड़ा व्यापार घाटा

  • भारत ने सिर्फ $1.96 बिलियन एक्सपोर्ट किया, जबकि
    $22.45 बिलियन का आयात किया

  • मुख्य कारण:
    स्विट्जरलैंड से भारी मात्रा में सोने का आयात
    (₹20.7 बिलियन सिर्फ 2021–22 में)

3. 📥 EFTA से आयात:

  • सोना, चांदी, कोयला, दवाएं, डेयरी मशीनरी, मेडिकल उपकरण

4. 📤 भारत से निर्यात:

  • केमिकल्स, लोहे–स्टील, खेल के सामान, यार्न, ड्रग्स, कांच के सामान

5. 🏢 निवेश के लिए समर्थन

  • India–EFTA Desk की शुरुआत
    ➡️ निवेश में मदद और EFTA कंपनियों को भारत में सेटअप करने में सुविधा


⚠️ भारत–EFTA डील की प्रमुख चुनौतियां

1. 🌪️ व्यापार घाटा

  • भारी गोल्ड इंपोर्ट के कारण भारत को घाटा

  • समाधान: ज्यादा वैल्यू-एडेड उत्पादों का निर्यात

2. 💊 डेटा एक्सक्लूसिविटी बनाम जनस्वास्थ्य

  • EFTA चाहता है कि दवा कंपनियों के नई दवाओं के टेस्ट डेटा को दोबारा इस्तेमाल न किया जाए
    ➡️ इससे भारत की जनरिक दवाओं पर असर पड़ेगा
    ➡️ भारत जनस्वास्थ्य और सस्ती दवाओं की सुरक्षा चाहता है

3. 📜 IPR प्रावधानों का खतरा

  • कुछ नियम भारत की
    Pre-grant opposition
    स्थानीय निर्माण की जरूरत
    पर असर डाल सकते हैं
    ➡️ भारत की दवा इंडस्ट्री और सस्ती दवाएं प्रभावित हो सकती हैं


🛤️ आगे की राह (Way Forward)

  1. व्यापार अंतर कम करें

    • गोल्ड इंपोर्ट पर निर्भरता कम करें

    • ज्यादा टेक आधारित और वैल्यू-एडेड उत्पादों का निर्यात करें

  2. ग्रीन स्किल्स पर फोकस करें

    • EFTA की मदद से सस्टेनेबिलिटी और इनोवेशन में भारत को आगे बढ़ाना चाहिए

  3. IPR नियमों में संतुलन

    • इनोवेशन की रक्षा करें, लेकिन गरीबों की दवा पहुंच को खतरे में न डालें

  4. India–EU FTA को साथ लेकर चलें

    • भारत EU के साथ भी FTA कर रहा है

    • दोनों को मिलाकर ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत को और मजबूत बनाना चाहिए


🧠 प्रीलिम्स के लिए Quick Facts

🔖 टॉपिक
📌 विवरण
TEPA साइन हुआ
10 मार्च 2024
लागू होने की तारीख
1 अक्टूबर 2025
EFTA देश
आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड
निवेश वादा
$100 बिलियन (15 वर्षों में)
सोने पर टैरिफ
कोई वास्तविक बदलाव नहीं
India–EFTA Desk
Invest India द्वारा शुरू किया गया
TEPA चैप्टर्स
14 (IPR, कस्टम्स, विवाद समाधान आदि)
छूट वाले क्षेत्र
डेयरी, सोया, कोयला, PLI-सेक्टर

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